रविवार, 21 अक्तूबर 2018

खुद को एलिट क्लास कहने के लिए दूसरों पर कूड़ा मत फेंकिए


हम लोग जब क्षेत्रीय हिंदी पत्रकारिता की बात करते हैं, तो उसे मेरे हिसाब से राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य से एकदम अलग देखना होगा। उनकी जरूरतों को ध्यान में रखना होगा। आप सीधे तौर पर हिंदी मीडिया को गलीच या नकारा नहीं कह सकते। वैसे जिन शब्दों का प्रयोग किया जाता है, उसमें मैंने काफी सम्मानित शब्दों का प्रयोग किया है। कृपा करके दिल्ली वाली पत्रकारिता को इससे अलग रखें।

स्वनामधन्य कई बड़े पत्रकार दिल्ली या विदेश में बैठकर हिंदी पत्रकारिता के हालात का अंदाजा लगा लेते हैं और इसे नकारा करार देते हैं। हो सकता है कि हम लोगों की तरह रांची या पटना में बैठा व्यक्ति लंदन या न्यूयार्क के अखबारों के बारे में रत्ती भर भी जानकारी नहीं रखता हो, लेकिन क्या विदेशी मीडिया या दिल्ली में बैठे लोग क्षेत्रीय स्तर पर हो रहे तमाम बदलावों से परिचित हैं। यहां तमाम दिक्कतों और परेशानियों के बावजूद जिस तरह लोग पत्रकारिता कर रहे हैं और उसके बारे में रिपोर्ट कर रहे हैं, उसे आप नजरअंदाज कैसे कर सकते हैं?

व्यावहारिक रूप में यह जरूरी नहीं कि जो क्षेत्रीय स्तर पर पत्रकारिता कर रहा हो, वह साहित्य प्रेमी हो या उसके बारे में वह काफी ज्ञान रखता हो। हो सकता है कि वह कोई व्यवसाय करते हुए लेखन कर रहा हो। आर्थिक परेशानियों के बाद भी अपने पत्रकारिता के जज्बे को जिंदा रख रहा हो।

क्षेत्रीय स्तर पर जो रिपोर्टिंग होती है, उसमें राज्य या क्षेत्र विशेष का ध्यान रखा जाता है। वहीं विदेशी या दिल्ली की इलेक्ट्रानिक मीडिया के तमाम दिग्गज सिर्फ एक पैमाना रखकर ही रिपोर्टिंग करते हैं। इधर के सालों में तो ग्राउंड रिपोर्टिंग का सिलसिला तो और ही कम हुआ है। शीर्ष मीडिया सिर्फ उन्हीं कोनों को छूती है, जहां उसका हित जुड़ा है। अखबार में कम से कम क्षेत्रीय संस्करणों में वहां की समस्याओं को एक पैमाना रखकर प्रकाशित तो किया जाता है।

हिंदी या अंग्रेजी साहित्य से जुड़ी रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहां काफी जगह है। तमाम संस्करणों में हो रहे बदलावों के बाद भी इन्हें जगह दी जा रही है। दिक्कत यही है कि जो शीर्ष मीडिया के लोग हैं, उन्हें छोटे स्तर पर हो पत्रकारिता में हो रहे बदलावों को जानने की फुर्सत ही नहीं है। तमाम हिंदी अखबारों को गरियाने वाले शीर्ष अंगरेजी दां या अन्य पत्रकार कभी खुद में भी झांक कर देख सकते हैं कि उनकी ओर से कितना संतुलन कायम रखा जा रहा है। सच्चाई यही है कि क्षेत्रीय समाज और राजनीति की रिपोर्टिंग स्थानीय स्तर पर जरूरी है। लेकिन इसके बहाने दूसरे छोर पर अपने ही साथी को नीच कहना कहां तक उचित है।

विदेशी मीडिया सिर्फ एक सिरे को पकड़ कर रिपोर्ट करता है। उससे आप तमाम हलचलों का अंदाजा नहीं लगा सकेंगे। आपको क्षेत्र स्तर पर हलचल का अंदाजा लगाने के लिए भी उसकी तह में जाना होगा, जो कि सिर्फ क्षेत्रीय पत्रकारिता में ही आप पा सकते हैं। दूसरी बात आप जब हमारे ही स्तर पर हमारी मानसिकता को गाली दे रहे हों, तो वहां पर सहमति या असहमति की गुंजाइश कहां बनती है। इसलिए खुद को एलिट क्लास का साबित करने के लिए दूसरे पर कूड़ा मत फेंकिए। घर आपका ही गंदा होगा।






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